तुंगविद्या जी का शारीरिक वर्ण (रंग) कुंकुम (लाल केसरिया) और चन्दन के मिश्रण के समान कांतिमान है। उनकी आभा सूर्य की किरणों जैसी प्रखर और शीतल है। वे 'पांडु' (हल्के पीले या क्रीम) रंग के अत्यंत महीन और सुंदर वस्त्र धारण करती हैं।
कुछ साधुओं की सहायता से वे बाबा तक पहुँचे और दीक्षा की याचना की, परंतु विष्णु दास बाबा महाराज ने स्पष्ट मना कर दिया। वे अत्यंत विरक्त संत थे
कोट-पेंट, हाथ में बंधी कीमती घड़ी और अपनी सामाजिक वेशभूषा में ही वे तत्काल वृंदावन की ओर दौड़ पड़े। वृंदावन पहुँचकर उन्होंने अपनी पुरानी पहचान को त्याग दिया और धोती-माला
उनका शारीरिक वर्ण (रंग) तड़ित (बिजली) के समान अत्यधिक देदीप्यमान और सुनहरी आभा वाला है। वे 'तारावली' (तारों के समूह) के समान सुंदर और झिलमिलाते हुए वस्त्र धारण करती हैं।
चित्रलेखा जी का शारीरिक वर्ण (रंग) 'केसर' के समान पीला और कांतिमान है। वे 'कांचन' (स्वर्ण) के समान चमकते हुए वस्त्र धारण करती हैं, जो उनके कलात्मक व्यक्तित्व को और भी निखारता है।
इन्दुलेखा जी का शारीरिक वर्ण (रंग) तपाये हुए स्वर्ण (तप्त कांचन) के समान चमकता हुआ और गौरवर्ण है। उनका मुखमण्डल पूर्ण चंद्रमा की भांति शीतल और कांतिमान है, इसीलिए उनका नाम 'इन्दुलेखा' (चंद्रमा की कला) सार्थक है।
उनका स्वरूप साक्षात करुणा और तेज का सम्मिश्रण है। उनका रंग 'गोरोचन' (पीलापन लिए हुए सुनहरा) के समान दीप्तिमान है और वे मयूर के पंखों के रंग के समान सुंदर वस्त्र धारण करती हैं।
चम्पकलता जी का शारीरिक वर्ण (रंग) खिलते हुए 'पीले चम्पा' के पुष्प के समान है। उनकी देह से सदैव चम्पा के फूलों जैसी मनमोहक सुगंध आती रहती है।