महाप्रभु की आज्ञा पाकर सनातन गोस्वामी वृंदावन आए। उस समय वृंदावन केवल एक घना वन था।
सनातन गोस्वामी को मथुरा में 'अद्वैत आचार्य' के प्राचीन विग्रह 'श्री मदन-मोहन जी' प्राप्त हुए।
उनके पूर्वज श्री सर्वज्ञ जगद्गुरु कर्नाटक के राजा थे। कालांतर में उनके वंशज बंगाल में आकर बस गए।
रूप गोस्वामी जी तीन भाई थे तीनों भाई बचपन से ही असाधारण बुद्धि और भक्ति भाव के धनी थे।
पद्म पुराण के अनुसार, शेषशय्या वन वह स्थान है जहाँ भगवान ने अपनी 'योगमाया' के साथ सृष्टि के कल्याण हेतु विचार-विमर्श किया था। इसे 'ज्ञान वन' भी कहा जाता है
यह वह स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर अपने ग्वाल-बालों के साथ प्रेम का जूठन साझा किया था।
भगवान वाराह ने पृथ्वी देवी को ब्रज के महात्म्य के बारे में बताते हुए वत्सय वन को 'अत्यंत गोपनीय' और 'प्रेम प्रदायक' बताया है।
भगवान वाराह ने इस वन की महिमा गाते हुए इसे 'पापमोचनी' स्थली बताया है। वाराह पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति यमुना के इस तट (रामघाट) पर स्नान कर इस वन में ध्यान लगाता है, उसे राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।
श्री अमृत वन साक्षात प्रेमानंद का स्वरूप है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ यहाँ की मानसिक यात्रा या प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसका हृदय भक्ति के अमृत से भर जाता है।
आज के आधुनिक युग में, जिसे हम 'मथुरा शहर' कहते हैं, वह कभी इन्ही वनों का हिस्सा था। यद्यपि कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक वनों की जगह ले ली है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित इसकी पवित्रता आज भी अक्षुण्ण है।