वैष्णव परंपरा के अनुसार, इस संप्रदाय के आद्य-प्रवर्तक स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं। भगवान नारायण (विष्णु) ने सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी को जो दिव्य ज्ञान प्रदान किया, वही आगे चलकर 'ब्रह्मा संप्रदाय' के नाम से जाना गया।
भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म
"न मे भक्तः प्रणश्यति" (मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता) — श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण का यह वचन महात्मा विदुर के जीवन में शत-प्रतिशत चरित्रार्थ होता है।
विदुरानी जी (जिन्हें कई पौराणिक संदर्भों में 'सुलभा' नाम से भी जाना जाता है) हस्तिनापुर के महाज्ञानी, नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान और धर्मनिष्ठा के प्रतीक महात्मा विदुर की धर्मपत्नी थीं।
निम्न वर्ग कुल में जन्म लेने के बावजूद अपनी अनन्य निष्ठा, निरहंकार, और निश्छल भक्ति के बल पर उन्होंने स्वयं भगवान श्री कृष्ण को यह सिद्ध करने पर मजबूर कर दिया कि "जाति-पांति पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।"
गुरु के इन वचनों को शबरी जी ने अपने जीवन का एकमात्र महामंत्र बना लिया। गुरुदेव तो परमधाम गमन कर गए, परंतु शबरी जी के हृदय में जलाकर गए प्रतीक्षा का वह दीप, जो दशकों तक अविरल जलता रहा।
महान पौराणिक व्यास-शिष्य महर्षि रोमहर्षण जी, सूत जी के पूज्य पिता थे। रोमहर्षण जी को स्वयं भगवान वेदव्यास जी ने पुराणों का ज्ञान प्रदान किया था। रोमहर्षण जी का नाम 'रोमहर्षण' इसलिए पड़ा क्योंकि जब वे भगवान की कथा सुनाते थे, तो सुनने वालों के रोंगटे (रोम) हर्ष से खड़े हो जाते थे।
बहुआयामी प्रतिभा, मॉडर्न लुक और हंसमुख अंदाज़ के लिए युवाओं के बीच पहचाने जाने वाले सागर गोस्वामी