श्री हित गोपीनाथ जी एक उच्च कोटि के पदकार भी थे। उनके पदों में विप्रलम्भ (विरह) और संयोग (मिलन) दोनों का अद्भुत चित्रण मिलता है। उनके द्वारा रचित पदों को संप्रदाय के 'समाज गायन' में बहुत आदर के साथ गाया जाता है।
पहले इन्हें आमेर के कनक वृंदावन में रखा गया और बाद में सिटी पैलेस के 'चंद्र महल' के ठीक सामने स्थापित किया गया, ताकि राजा अपने महल की खिड़की से सीधे भगवान के दर्शन कर सकें।
इतिहास कहता है कि करौली के महाराजा गोपाल सिंह जी की रानी, जो जयपुर की राजकुमारी थीं, मदन मोहन जी की अनन्य भक्त थीं। उनकी जिद और भक्ति के वशीभूत होकर, अंततः संवत 1705 के आसपास इन विग्रहों को करौली
भक्तों का विश्वास है कि श्री गोपीनाथ जी के दर्शन करने से भगवान के वक्षस्थल (हृदय) के दर्शन का फल प्राप्त होता है। यहाँ राधा जी के साथ ललिता सखी और विशाखा सखी की भी पूजा की जाती है
वह नूपुर साधारण नहीं था; उसकी आभा अलौकिक थी। मान्यता है कि वह नूपुर स्वयं श्रीमती राधारानी का था, जो रास के दौरान वहाँ गिर गया था। जब राधारानी एक गोपी के भेष में उसे लेने आईं, तो श्यामानंद जी ने अपनी निश्छल भक्ति से उन्हें पहचान लिया।
गोपाल भट्ट गोस्वामी अपने साथ लाए गए शालिग्रामों की नित्य सेवा करते थे। संवत 1599 (1542 ईस्वी) के आसपास की बात है, वृन्दावन में एक धनी भक्त आए जिन्होंने सभी विग्रहों के लिए सुंदर वस्त्र और आभूषण दान किए।
आज हम आपको मिलाएंगे कवि अविनाश श्रीवास्तव जी से उनकी कलम में एक जादुई स्पर्श है, जो ठाकुर श्री राधारमण जी......
राधा दामोदर मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि यह ज्ञान का भी केंद्र रहा है। इस्कॉन (ISKCON) के संस्थापक श्रील प्रभुपाद ने संन्यास लेने के बाद इसी मंदिर के एक छोटे से कमरे