भगवान वाराह ने पृथ्वी देवी को ब्रज के महात्म्य के बारे में बताते हुए वत्सय वन को 'अत्यंत गोपनीय' और 'प्रेम प्रदायक' बताया है।
"वृंदावनं द्वादश काननैरवृतं पुण्यं। प्रमोदवनं तत्र सर्वानंद प्रदायकम्॥" अर्थात्: वृंदावन बारह पुण्य वनों से घिरा है, और उनमें 'प्रमोद वन' सभी प्रकार के आनंद प्रदान करने वाला है।
भगवान वाराह ने इस वन की महिमा गाते हुए इसे 'पापमोचनी' स्थली बताया है। वाराह पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति यमुना के इस तट (रामघाट) पर स्नान कर इस वन में ध्यान लगाता है, उसे राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।
"असिकुण्डं परं तीर्थं सर्वव्याधिविनाशनम्। तत्र स्नात्वा नरो देवि मम लोकं प्रपद्यते॥" (हे देवि! असि कुंड एक परम तीर्थ है जो सभी व्याधियों का नाश करने वाला है। वहाँ स्नान करने मात्र से मनुष्य मेरे लोक को प्राप्त करता है।)
श्री गंधर्व वन केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत और भक्ति की आदि-स्थली है। यह वन हमें सिखाता है कि कला जब ईश्वर को समर्पित होती है, तो वह 'प्रसाद' बन जाती है।
श्री अमृत वन साक्षात प्रेमानंद का स्वरूप है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ यहाँ की मानसिक यात्रा या प्रत्यक्ष दर्शन करता है, उसका हृदय भक्ति के अमृत से भर जाता है।
आज के आधुनिक युग में, जिसे हम 'मथुरा शहर' कहते हैं, वह कभी इन्ही वनों का हिस्सा था। यद्यपि कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक वनों की जगह ले ली है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित इसकी पवित्रता आज भी अक्षुण्ण है।
"किशोरकुण्डं नाम अस्ति सर्वपापविनाशनम्। तस्य दर्शनमात्रेण नरो मुच्यते बन्धनात्॥" (अर्थात: किशोर कुंड नाम का यह स्थान सभी पापों का विनाश करने वाला है। इसके दर्शन मात्र से मनुष्य संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।)