वराह पुराण के 'मथुरा महात्म्य' में भगवान वराह पृथ्वी देवी को संबोधित करते हुए कहते हैं: "अंजनं नाम तद्वनं सर्वसौभाग्यवर्धनम्। तत्र स्नात्वा नरो देवि मम रूपमवाप्नुयात्॥"
"नन्दप्रेक्षणकं नाम वनं पापप्रणाशनम्। दृष्ट्वा नन्दपदम तत्र मुच्यते सर्वपातकैः॥"
(नंद प्रेक्षण नाम का यह वन पापों का नाश करने वाला है। यहाँ नंद बाबा के पदचिन्हों और उनकी वात्सल्य स्थली के दर्शन से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।)
यह वन 'संकेत' के निकट होने के कारण युगल सरकार के गुप्त मिलन का भी साक्षी है। यहाँ की प्रत्येक लता को सखियों का स्वरूप माना जाता है।
"करहलाख्ये वने रम्ये रासमण्डलमण्डिते। यत्र कृष्णो हली सार्धं चचार सुरसुन्दरः॥" (रमणीय करहला वन में, जो रास मंडल से सुशोभित है, वहाँ कृष्ण और बलराम ने सुर-सुंदरियों के साथ विहार किया था।)
"प्रमदं नाम तद्वनं सर्वपापप्रणाशनम्। तत्र गत्वा नरो देवि मम लोके महीयते॥" (हे देवि! प्रमद नाम का वह वन सभी पापों का नाश करने वाला है। वहाँ जाने वाला मनुष्य मेरे लोक को प्राप्त करता है।)
संकेत वन अपने 'करील' के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। रसखान जैसे संतों ने कहा है "इन करील के कुंजन ऊपर वारौं कोटिक कलधौत के धाम"।
"नन्दीश्वरं गिरीन्द्रं च दृष्ट्वा नत्वा विधानतः। कृष्णस्य सदनं गत्वा मुच्यते सर्वपातकैः॥" (नंदिश्वर गिरि के दर्शन और वंदन करने से मनुष्य सभी पातकों से मुक्त होकर कृष्ण धाम को प्राप्त होता है।)
“गच्छनन्द्ब्रजं तात तत्र नन्दयशोदयोः। कृष्णं रामं च संरक्षन् गोपगोपीजनैर्वृतः॥” ग्रंथों के अनुसार, गोकुल वन का विस्तार यमुना के तट पर सघन कुंजों और विशाल चरागाहों के रूप में था। यह वन केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि 'गो-कुल' (गायों का परिवार) का आश्रय स्थल था।