महर्षि वाल्मीकि 'रत्नगिरि' या 'रत्नाकर' के नाम से जाने जाते थे। वे अपने कुटुंब के भरण-पोषण के लिए तमसा नदी के बीहड़ वनों में राहगीरों को लूटने और हिंसा का कार्य करते थे। उनके जीवन में न तो धर्म का ज्ञान था और न ही भक्ति का आस्वादन।
ब्रह्मा जी 'आचार्य' और 'भक्त' की भूमिका में हैं। एक सच्चा भक्त कभी यह नहीं चाहता कि भगवान को छोड़कर उसकी स्वयं की पूजा हो। ब्रह्मा जी ने स्वयं भगवान श्रीहरि और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। वे जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के बजाय सीधे 'हरि-चरणों' की ओर भेजते हैं।
सालबेग का पालन-पोषण एक मुस्लिम माहौल में हुआ, लेकिन उनकी माता के मन में छिपी हिंदू धार्मिक चेतना ने उनके अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव डाला। ओड़िशा के प्रसिद्ध इतिहासकार और शोधकर्ता डॉ. के.सी. पाणिग्रही....
भगवान शिव काल के भी काल 'महाकाल' बनकर शिवलिंग से प्रकट हो गए और यमराज को परास्त कर मार्कंडेय को अमरता का वरदान दिया। भक्त की रक्षा के लिए मृत्यु के नियम को बदल देना शिव के भक्त-प्रेमी स्वभाव को दर्शाता है।
प्रायः देखा जाता है कि जब किसी साधक या संत को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तो उसमें अहंकार प्रवेश कर जाता है। परंतु श्री गणेश ....
तिरोभाव उत्सव विशेष : श्री बाबा महाराज कहते थे कि याद रखो जीव की आध्यात्मिक प्रगति रातों-रात नहीं होती। आत्मा धीरे-धीरे, एक-एक कदम करके आगे बढ़ती है।
श्री चैतन्य महाप्रभु के पुरी आने से पहले, गुंडीचा मंदिर की सफाई जगन्नाथ मंदिर प्रशासन, राजा के सेवकों और स्थानीय सफाई कर्मचारियों द्वारा की जाती थी। श्री चैतन्य महाप्रभु पुरी आए, तो उन्होंने इस साधारण सफाई कार्य को 'महा-मार्जन लीला' का रूप दे दिया।
अनवसर के 15 दिनों में उनकी मूर्तियों की मरम्मत, लेपन और नया श्रृंगार पूरी तरह से 'दइतापति' सेवकों द्वारा अत्यंत गोपनीयता के साथ किया जाता है, जो खुद को भगवान का वंशज मानते हैं।