भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म
"न मे भक्तः प्रणश्यति" (मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता) — श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण का यह वचन महात्मा विदुर के जीवन में शत-प्रतिशत चरित्रार्थ होता है।
निम्न वर्ग कुल में जन्म लेने के बावजूद अपनी अनन्य निष्ठा, निरहंकार, और निश्छल भक्ति के बल पर उन्होंने स्वयं भगवान श्री कृष्ण को यह सिद्ध करने पर मजबूर कर दिया कि "जाति-पांति पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।"
गुरु के इन वचनों को शबरी जी ने अपने जीवन का एकमात्र महामंत्र बना लिया। गुरुदेव तो परमधाम गमन कर गए, परंतु शबरी जी के हृदय में जलाकर गए प्रतीक्षा का वह दीप, जो दशकों तक अविरल जलता रहा।
बहुआयामी प्रतिभा, मॉडर्न लुक और हंसमुख अंदाज़ के लिए युवाओं के बीच पहचाने जाने वाले सागर गोस्वामी
महान पौराणिक व्यास-शिष्य महर्षि रोमहर्षण जी, सूत जी के पूज्य पिता थे। रोमहर्षण जी को स्वयं भगवान वेदव्यास जी ने पुराणों का ज्ञान प्रदान किया था। रोमहर्षण जी का नाम 'रोमहर्षण' इसलिए पड़ा क्योंकि जब वे भगवान की कथा सुनाते थे, तो सुनने वालों के रोंगटे (रोम) हर्ष से खड़े हो जाते थे।
व्यास जी की लीलाएँ हमें सिखाती हैं कि चाहे मनुष्य कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी या शास्त्रज्ञ क्यों न बन जाए, यदि उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम, करुणा, नम्रता और अनन्य शरणागति नहीं है, तो उसका सारा ज्ञान व्यर्थ है।
परंतु भक्ति मार्ग के आचार्यों (जैसे श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर) का मानना है कि शुकदेव जी का अद्वैत ज्ञान और निर्गुण समाधि केवल उनकी भक्ति की पृष्ठभूमि (Background) थी।