
भक्तमाल के भक्त प्रवर श्री तत्त्वाजी का दिव्य चरित्र
, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।

, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।

कुछ अन्य रामानंदीय ग्रंथों के मत के अनुसार, वे प्रभु श्री रामचंद्र जी के अनन्य पार्षद के रूप में धरा पर अवतरित हुए थे ताकि कलियुग के जीवों को 'नाम-महिमा' और 'भोग-महिमा' का व्यावहारिक ज्ञान करा सकें।

श्री नाभादास जी महाराज कृत 'श्री भक्तमाल' के अनमोल मणियों में 'राजर्षि' से 'ब्रह्मर्षि' बनने वाले परम भक्त श्री पीपा जी महाराज का चरित्र अत्यंत विलक्षण है।

धन्य धन्य नरहरि गुरु, ज्ञान रूप अवतार। तुलसी से जगमग किये, दे भक्ति को सार